राज़ – एक रहस्यमयी कहानी 🌑🔐
उस रात बारिश कुछ ज़्यादा ही तेज़ थी।
अमन अपनी पुरानी पुश्तैनी हवेली के सामने खड़ा था। वही हवेली… जिसे उसके पिता ने मरते वक़्त बस एक ही बात कहकर छोड़ दिया था—
“उस कमरे को कभी मत खोलना…”
आज पिता को गए 10 साल हो चुके थे।
और आज ही हवेली की चाबी अपने-आप उस कमरे के दरवाज़े में फँसी मिली।
अमन का दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
दरवाज़े पर लिखा था—
कमरा नंबर 13
उसने काँपते हाथों से चाबी घुमाई।
क्रीईई…
दरवाज़ा खुल गया।
अंदर कोई फर्नीचर नहीं था।
बस दीवार पर टंगी एक पुरानी घड़ी,
जो उल्टी चल रही थी।
टिक… टिक…
लेकिन सुइयाँ पीछे जा रही थीं।
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“आख़िरकार तुम आ ही गए…”
अमन पलटा।
वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन ज़मीन पर पड़ा था एक डायरी।
पन्ने पलटे तो पहले ही पेज पर लिखा था—
“अगर तुम ये पढ़ रहे हो,
तो समझ लो—
राज़ अब तुम्हें चुन चुका है।”
अमन की साँसें तेज़ हो गईं।
डायरी में लिखा था कि हर पीढ़ी में
इस परिवार का एक इंसान
उस कमरे का रक्षक बनता है।
जो राज़ बाहर निकल गया…
तो वक़्त रुक जाएगा।
अचानक घड़ी ज़ोर से बजने लगी।
कमरे की दीवारों पर दरारें पड़ने लगीं।
और आईने में अमन को
अपना चेहरा नहीं दिखा…
बल्कि
अपने पिता का।
पिता की परछाईं बोली—
“अब मेरी बारी खत्म…
अब तुम्हारी है।”
घड़ी रुक गई।
बारिश थम गई।
सुबह जब लोग हवेली के पास से गुज़रे,
तो कमरे नंबर 13 का दरवाज़ा बंद था।
और अंदर…
घड़ी फिर से सीधी चल रही थी।
लेकिन अब
रक्षक बदल चुका था।





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