खामोश घड़ी का रहस्य
शहर के बीचों-बीच एक पुरानी हवेली थी। लोग कहते थे कि वहाँ समय रुक जाता है।
हर रात ठीक 12:07 बजे हवेली की सबसे ऊपरी मंज़िल से एक घड़ी की टिक-टिक सुनाई देती थी… जबकि उस कमरे में कोई घड़ी थी ही नहीं।
राहुल, जो एक पत्रकार था, सच जानना चाहता था। एक रात वह हवेली में घुसा।
कमरे में धूल, जाले और टूटी दीवारें थीं। लेकिन जैसे ही घड़ी ने 12:07 बजाए—
सब कुछ बदल गया।
कमरा वैसा ही हो गया जैसा 25 साल पहले था। दीवारों पर नई पेंटिंग, मेज़ पर जलता लैम्प… और सामने खड़ा था राहुल खुद, लेकिन बचपन वाला।
अचानक एक आवाज़ गूंजी—
“अगर सच जानना है, तो उस दिन को बदलो जब तुम भागे थे।”
राहुल को याद आया—उस दिन उसने अपने पिता को अकेला छोड़ दिया था… उसी रात उनके पिता की रहस्यमयी मौत हो गई थी।
घड़ी की सुइयाँ उल्टी घूमने लगीं।
राहुल ने कदम आगे बढ़ाया—
और तभी घड़ी रुक गई।
सुबह लोग बोले,
“आज हवेली से टिक-टिक नहीं आई।”
लेकिन शहर के अख़बार में एक नई हेडलाइन थी—
“25 साल पुराने मर्डर केस का सच अचानक सामने आया।”
और नीचे रिपोर्टर का नाम था—
राहुल
(जिसे कोई आज तक दोबारा नहीं देख पाया)





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